YOUNG INDIAN WARRIORS

युवा भारत की दमदार आवाज : के.कुमार 'अभिषेक'

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K.Kumar 'Abhishek'


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क्या ‘मोदी भक्ति’ ही ‘देशभक्ति’ का पैमाना है?

Posted On: 17 Aug, 2017  
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Politics में

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एक अनुसंधान : ईश्वर क्या हैं?

Posted On: 12 Aug, 2017  
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Religious में

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आपका ‘धर्म’ क्या है?

Posted On: 18 Jul, 2017  
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Religious में

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मोदी नहीं तो कौन?

Posted On: 15 Jul, 2017  
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Politics में

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हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

Posted On: 11 Feb, 2016  
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“बापू, हमें माफ़ कर दो …भटक गए तेरी राहों से”

Posted On: 31 Oct, 2015  
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जातिवाद बनाम राष्ट्रवाद

Posted On: 20 Sep, 2015  
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लोकतंत्र के मंदिर में अलोकतांत्रिक पुजारी

Posted On: 24 Jul, 2015  
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‘विकास’ की कसौटी

Posted On: 7 Jul, 2015  
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”मैं युवा हूँ”

Posted On: 19 Apr, 2015  
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क्या ईश्वर है? कभी एक कागज के मोड़ कर बनाए गए हवाई जहाज के खिलौने को देखें. कागज का जहाज एक बेहद साधारण सी रचना है. मान लीजिए हम कहीं सुनसान जंगल में जा रहे हैं. वहां हमें एक कागज का जहाज कहीं दिखाई देता है. क्या हम यह मानेंगे कि हवा में कागज उड़ा पेड़ों से/ पत्थरों से टकराया लगातार टकराने से कागज ने हवाई जहाज का रूप ले लिया. भले ही हमें वहां कोई आदमी दिखाई ना दे परन्तु तब भी हम कहेंगे कि जरुर इसे किसी ने बनाया है. ----- यदि कागज के खिलौने को बनाने वाला कोई है तो पक्षी के परों /पंखों को बनाने वाला भी कोई जरुर होना चाहिए . पक्षी के परों की रचना तो कागज के जहाज से बेहद जटिल है . पंखों की आश्चर्यजनक बनावट अपने पंखों को एक ही बार नीचे की तरफ फड़फड़ाकर एक समुद्री पक्षी बड़ी तेज़ी से आसमान की तरफ निकल पड़ता है। जैसे ही वह ऊँचाई पर पहुँचता है, वह चक्कर काटते हुए हवा के सहारे आराम से और भी ऊपर उठता है। अपने पंखों और पूँछवाले परों के कोण में ज़रा-सा फेरबदल करके वह बिना पंख फड़फड़ाए उड़ सकता है। आखिर यह पक्षी इतनी खूबसूरती और बेहतरीन तरीके से यह कलाबाज़ी कैसे दिखा पाता है? यह काफी हद तक उसके परों का कमाल है! सभी जंतुओं में से सिर्फ पक्षियों के पर होते हैं। ज़्यादातर पक्षियों के शरीर में तरह-तरह के पर होते हैं। एक तरह का पर जो हमें साफ दिखायी देता है, वह है देहपिच्छ (कंटूर फेदर्स्)। ये पर पक्षी के पूरे शरीर में पास-पास सटे हुए पाए जाते हैं। इनसे पक्षियों का ऐसा आकार बनता है, जिससे वे बड़ी आसानी से हवा में उड़ पाते हैं। देहपिच्छ, पक्षी के पंख और पूँछ पर पाए जाते हैं, जो उड़ने के लिए बेहद ज़रूरी होते हैं। एक हमिंगबर्ड में 1,000 से भी कम और एक हंस में 25,000 से भी ज़्यादा देहपिच्छ हो सकते हैं। पक्षियों के पर वाकई बेमिसाल कारीगरी का सबूत हैं! पर की बीचवाली डंडी को रेकिस कहा जाता है, जो लचीली और काफी मज़बूत होती है। इस डंडी से परों के रेशों (बाब्र्स्) की कतारें निकलती हैं और ये रेशे एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इस तरह पर के दोनों तरफ का हिस्सा समतल होता है जिसेवेन कहा जाता है। परों के रेशे एक-दूसरे से कैसे जुड़े रहते हैं? हर रेशे में सैकड़ों और भी छोटे-छोटे हुकनुमा रेशे (बाब्र्यूल्स्) होते हैं, जो आस-पास के हुकनुमा रेशों से फँसे होते हैं। ये एक ज़िप की तरह काम करते हैं। जब ये छोटे-छोटे रेशे खुल जाते हैं, तो पक्षी को सिर्फ अपने पंखों को सँवारने की ज़रूरत होती है, जिससे हुकनुमा रेशे दोबारा एक-दूसरे से फँस जाते हैं। अगर आप भी एक बिखरे पर को हलके-से अपनी उँगलियों से सँवारें, तो आप पाएँगे कि उनके रेशे वापस एक-दूसरे से फँस जाते हैं और पर फिर से समतल हो जाता है। खासकर उड़ान में मदद देनेवाले पर समान आकार के नहीं होते हैं। पर के पीछे का हिस्सा, आगे के हिस्से से ज़्यादा चौड़ा होता है। इस तरह की डिज़ाइन हवाई जहाज़ के पंखों में देखने को मिलती है। इसी डिज़ाइन की वजह से, पक्षी का हरेक पर एक छोटे पंख की तरह काम करता है और उड़ान भरने में मदद देता है। इसके अलावा, अगर आप पक्षियों की उड़ान में मदद देनेवाले एक बड़े पर की जाँच करें, तो आप पाएँगे कि रेकिस के निचले हिस्से में खाँचा बना होता है। इस मामूली-सी डिज़ाइन से रेकिस को मज़बूती मिलती है। इसलिए आप रेकिस को किसी भी तरह मोड़ दीजिए, यह मुड़ी नहीं रहेगी बल्कि वापस सीधी हो जाएगी। परों के अनेक काम देहपिच्छ के बीच-बीच में रोमपिच्छ (फाइलोप्लूम्स्) नाम के लंबे और पतले किस्म के पर औरपाउडर फेदर्स् भी पाए जाते हैं। माना जाता है कि रोमपिच्छ की जड़ों में कुछ इंद्रियाँ होती हैं, जो बाहरी परों में किसी तरह की गड़बड़ी पैदा होने पर फौरन पक्षी को खबरदार कर देती हैं। इसके अलावा, इन इंद्रियों की मदद से पक्षी हवा में अपनी रफ्तार का भी पता लगा सकता है। सिर्फ पाउडर फेदर्स् के रेशे लगातार उगते हैं और पक्षी के शरीर से कभी नहीं झड़ते। इसके बजाय, ये रेशे महीन पाउडर बन जाते हैं और पक्षी के शरीर पर जलरोधक का काम करते हैं। पक्षियों के परों का एक और काम है। वे पक्षियों को गरमी, सर्दी और सूरज की खतरनाक किरणों से बचाते हैं। मिसाल के लिए, समुद्री बत्तख महासागर की चुभनेवाली ठंडी हवाओं में पलती-बढ़ती हैं। कैसे? उनके भरे-पूरे देहपिच्छ के नीचे नरम, रोएँदार परों की एक मोटी परत मौजूद होती है। इन परों को कोमलपिच्छ (डाऊन फेदर्स्) कहते हैं। ये पर लगभग 1.7 सेंटीमीटर की मोटाई तक घने हो सकते हैं और इनसे बत्तख का ज़्यादातर शरीर ढका होता है। कोमलपिच्छ, शरीर की गरमी को बाहर न निकलने देने में इतने असरदार होते हैं कि अब तक इंसानों ने ऐसी कोई चीज़ नहीं बना पायी है जो इसकी बराबरी कर सके। समय के गुज़रते, पक्षियों के पर खराब या नष्ट हो जाते हैं, इसलिए पक्षी अपने पुराने परों को गिरा देते हैं और उनकी जगह नए पर उग आते हैं। ज़्यादातर पक्षियों के पंख और पूँछ के पर एक निश्‍चित समय में और थोड़े-थोड़े करके झड़ते हैं, जिससे कि उन्हें उड़ने में कोई परेशानी नहीं होती। हवाई जहाज़ों की डिज़ाइन बनाने, उन्हें आकार देने और उन पर कुशलता से काम करने के बाद ही, ये उड़ने के लायक बनते हैं। उड़ने के लिए सिर्फ पक्षियों के पर काफी नहीं विकासवादियों के लिए सिर्फ यह एक मुश्किल नहीं कि परों की बनावट में कोई खोट नहीं है। क्योंकि देखा जाए तो पक्षी का एक-एक अंग उड़ने के लिए ही बना है। मिसाल के लिए, पक्षियों की हड्डियाँ हलकी और खोखली होती हैं और उनकी साँस लेने की व्यवस्था बहुत ही अनोखी और बढ़िया है। इतना ही नहीं, उनके शरीर में खास किस्म की माँस-पेशियाँ होती हैं, जो पंखों को फड़फड़ाने और उन्हें काबू में रखने में मदद देती हैं। यहाँ तक कि पक्षियों में कई ऐसी माँस-पेशियाँ भी हैं, जो हरेक पर को अपनी जगह में बनाए रखती हैं। यही नहीं, पक्षियों की नसें हर माँस-पेशी को उनके मस्तिष्क से जोड़े रखती हैं। यह मस्तिष्क है तो छोटा, मगर बड़ा बेमिसाल है, क्योंकि यह पक्षियों के उड़ने की सारी व्यवस्था को एक-साथ, अपने आप और ठीक-ठीक काबू में रखता है। जी हाँ, पक्षियों को उड़ने के लिए सिर्फ परों की नहीं, बल्कि इन सभी अंगों की ज़रूरत होती है। ---- यदि कागज के जहाज का निर्माता मनुष्य है तो पक्षियों का निर्माता ईश्वर है

के द्वारा:

किसी भी वस्तु के निर्माण के लिए 3 का एक साथ होना जरुरी है. 1- निर्माण सामग्री = Raw Material ( जिसे मैटर कहते हैं) 2- निर्माता ( निर्माण करने वाला)= Creator/ Maker 3- जानकारी या सूचना = Information ----- मामूली सी गुडिया हो या अत्यन्त जटिल कम्प्यूटर इन 3 के बिना बनाना संभव नहीं है. --------- जितना जटिल ( Complex) निर्माण उतनी जटिल सूचना जटिल सूचना के लिए बुद्धिमान निर्माता ------- जीवन के लिए जरुरी घटक 1- प्रोटीन ( निर्माण सामग्री) 2- DNA - सूचना बिना DNA के प्रोटीन का बनना असम्भव है क्योंकि प्रोटीन के बनने की सूचना DNA में होती है. बिना प्रोटीन के DNA नहीं बन सकता क्योंकि DNA कोशिका में स्थित है. इसलिए जीवन का निर्माता इनसे अलग होना चाहिए. ------ जिसे इस पर प्रश्न करना हो वह पहले इस 3 के संयोग के बिना कोई वस्तु बना कर दिखाएं. 1- निर्माण सामग्री = Raw Material ( जिसे मैटर कहते हैं) 2- निर्माता ( निर्माण करने वाला)= Creator/ Maker 3- जानकारी या सूचना = Information ----------------------------------------------- ---- बिग बैंग से निर्माण असम्भव - ----- नास्तिक सिद्धान्त : अचानक एक ज़ोरदार धमाका ( बिग बैंग) हुआ और दुनिया अपने आप बन गयी। 1. यह धमाका किसने किया और यह किस वजह से हुआ? कल्पना करें एक प्रेस ( छापाखाना ) है. उसमे अलग अलग रंग के स्याही के डिब्बे है. कागज है . तेज भूकम्प आया स्याही उडी और समाचार पत्र छप गया? जीवन समाचार पत्र से हजारों गुणा जटिल है. 2. किस बात में तर्क है—शुरू में कुछ नहीं था फिर सबकुछ अपने आप बन गया, या कोई तो था जिसने सबकुछ बनाया? “जंगल से जाते वक्‍त अगर आपको एक सुंदर-सा घर दिखायी दे, तो क्या आप यह सोचेंगे, ‘अरे वाह! कितना सुंदर घर है। पेड़ अपने आप कटकर आड़े-तिरछे गिरे और यह घर बनकर तैयार हो गया।’ कितनी बेतुकी सी बात है, ऐसा हो ही नहीं सकता! तो हम यह कैसे मान लें कि दुनिया में सबकुछ अपने आप बन गया?” विकासवाद एक कल्पना डार्विन सिद्धान्त : इंसान बंदरों से आया। कुछ का मानना है कि सभी जीवधारी विकसित होकर बने हैं जैसे बंदर से मनुष्य इसमें ईश्वर की जरूरत क्या है? समस्या यह है कि इस बात का अभी तक एक भी प्रमाण नहीं है कि मनुष्य बंदर से विकसित हुआ है. अभी तक यह केवल कल्पना ही है. 3. अगर इंसान जानवरों से आया जैसे बंदर से, तो फिर क्यों इंसान और बंदर के दिमाग में इतना फर्क है? 4. क्यों छोटे-से-छोटे जीव की भी बनावट इतनी अनोखी है? दावा: विकासवाद के पक्के सबूत हैं। 5. विकासवाद का दावा करनेवालों ने क्या खुद इन सबूतों की जाँच की है? 6. क्या आप जानते हैं कि ऐसे कितने लोग हैं जो विकासवाद पर सिर्फ इसलिए यकीन करते हैं क्योंकि उन्हें बताया गया है कि सभी लोग इसे मानते हैं?

के द्वारा:

बात तो आपकी शत प्रतिशत जायज है. इस पर बहस होती रही है, पर नतीजा अभीतक हासिल नहीं हुआ. दूसरी तरफ जाति को पूर्णत: समाप्त करने की भी तो बात नहीं हो रही न! जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रीयता गंभीर समस्या बनती जा रही है . बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों को इस पर विचार करनी चाहिए पर राजनीतिज्ञ तो जहाँ अपना फायदा देखते हैं, वहीं अपनी रोटी सेंकने लगते हैं. नहीं तो क्या जरूरत थी प्रधान मंत्री को अपनी जाति OBC बताने की, अमित शाह को यह कहने की कि भाजपा ने सबसे अधिक OBC मुख्य मंत्री और प्रधान मंत्री दिए हैं. अभी बिहार में टिकट देते वक्त हर क्षेत्र में जातियों के हिशाब से ही टिकट दिए जा रहे हैं, चाहे वह किसी भी पार्टी में हो. अत: इस पर बात तभी तक उचित जान पड़ती है जब तक अपना हित साधित होता रहे. सबके लिए योग्यता के अनुसार उचित और सामान अवसर देने की बात ही क्यों न की जाय? पिछड़े और दलित लोगों को अधिक से अधिक सुविधा देना अलग बात है पर उसे सुविधाभोगी बनाना गलत बात है. बाकी आप सब समझते हैं.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

यह भारतीय जनतंत्र के लिए संक्रमण काल है जहां दस वर्ष पहलेसत्ता का सत्तू चाट कर अपने को कर्मयोगी कहने वाली पार्टी फिर दस वर्ष बाद सत्ता में लौटी है । इसलिए नरेंद्र मोदी थ्योरी जो गुजरात में विकसित हुई है की एक बार सत्ता पा जाओ तो उससे चिपक जाओ येनकेन प्राक्ररेर्ण सत्ता बनाये रखो ? और गलती भारत रत्न श्री बाजपाई ने की थी की 6 माह पहले चुनाव कराये थे और उस समय के गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी को राज धर्म निभाने की हिमाकत की थी ? इसलिए आज देश में लोक तंत्र तो है जिसका धर्म केवल जनता जानती है और पांच वर्ष में जब उसे अवसर मिलता है उसका उपयोग भी कायदे से करती है ? इस लिए टुच्चे राजनेताओं से लोकतंत्र के आदर्शों की अपेक्षा करना शायद उचित नहीं होगा ।। ,spdingh

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

इसके लिए हमें एक ऐसी वैचारिक संरचना तैयार करनी होगी ..जिससे हमारी आने वाली पीढी आर्थिक विकास के साथ-साथ शैक्षणिक, मानसिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, और व्यवहारिक विकास का महत्वा भी समझ पाये…और इसे अपने जीवन में उतार सके | तभी हम सही अर्थों में सर्वांगीण विकास का लक्ष्य प्राप्त कर, राष्ट्र और समाज को एक स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित कर पाएंगे | कहते हैं जब तक परिवर्तन का प्रयास हर स्तर से न हो, यह सिर्फ एक शब्द बन के रह जायेगा | आज जरुरत है की हम सभी ‘विकास’ की सही अर्थ समझें…और समझाएं | विशेषकर हमारे समाज के बुद्धिजीवी, लेखक-विचारक,पत्रकार, समाजसेवी..जो अब तक विकास की घिसी-पिटी परिभाषा का समर्थन करते रहे हैं….आगे आएं और समाज को सही दिशा दिखायें | साथ ही हमारे माननीय नेतागण अगर संभव हो तो …अपनी राजनैतिक रोटी सेंकने के प्रयास में …अफवाहों की आंच न लगाएं तो समाज पर बड़ी मेहरबानी होगी | हम सभी को मिलकर हर हाल में यह तय करना होगा की…..हम एक राष्ट्र और समाज के रूप में विकास की ऐसी रफ़्तार पकड़ें, जो सभी मानकों के अनुरूप हों और जब हम अपने मंजिल पर पहुंचे ..हमारी मर्यादा, हमारे मूल्य, हमारी सभ्यता और संस्कृति जमापूंजी के रूप में हमारे साथ हो | हम सब मिलकर विकास का ऐसा स्वप्न संजोएं…जहाँ लोगों के पास शिष्टता भी होगी, ज्ञान-विज्ञानं भी होगा, स्वास्थ्य भी होगा, सभ्यता और संस्कृति के साथ-साथ ढेर सारा पैसा भी हो | bahut hee sundar! bahut bahut badhai

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आज हमारे भारतीय समाज में शिक्षा का उदेश्य ‘ज्ञानोपार्जन’ नहीं, अपितु ‘धनोपार्जन’ हो गया है! आज छात्र, अभिभावक, और गुरु …तीनो के लिए शिक्षा का औचित्य सिर्फ और सिर्फ प्रमाणपत्रों कि प्राप्ति रह गया है, जिससे नौकरी या, व्यवसाय के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाया जा सके! कड़वी परन्तु वास्तविक सचाई है कि, आज हमारे जीवन में पाठ्य पुस्तकों कि सिखाई गयी बातों का कोई महत्वा नहीं है! एक इंसान के रूप में हमारे कर्तव्यों और सामर्थ्यवान जीवन के सिद्धांतों कि जो सिख हमारी पुस्तकों में मिलती है, आज छात्रों के लिए सिर्फ और सिर्फ परीक्षा कि वस्तु मात्र है! आज छात्र सिर्फ पाठ्य पुस्तकों को रट्टा मार रहे है, जिससे वे परीक्षा में पूछे गए सवालों का सही जवाब देकर अच्छे अंक प्राप्त कर सकें.! एक बार परीक्षा समाप्त हुई …पुस्तकों कि पढ़ी गयी बातों को हम अपनी सोच के दायरे से बाहर निकल फेंकते है ..!बहुत सटीक और प्रभावी लेखन मित्रवर अभिषेक जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

.अभिषेक जी गीता मैं भगवान क्रष्ण ने अध्यात्म ज्ञान को ही ज्ञान कहा है वाकी सब अज्ञान । नैतिक शिक्षा के पक्षधर नैतिक शिक्षा को ही ज्ञान कहते हैं । नैतिक शिक्षा संस्कारों से भी मिलती है । संस्कार पुर्व जन्म से भी होते हैं । जीवन एक कला है कैसे उत्तम जीवन जी सकले हैं यह चतुर लोग ही जानते हैं । उनके लिए डिग्रीयां हासिल कर लेना भी एक कला ही है । नौकरी या व्यवसाय ,राजनीति भी एक कला ही है । शिक्षा की परिभाषा अपने क्षेत्र मैं प्रवीण होना ही है । यदि आप अपने क्षेत्र मैं प्रवीण हो चुके हैं तो आप उस क्षेत्र के शिक्षित हैं । जैसे हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्रमोदी जी । ओम शांति शांति ......................................

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

अभिषेक जी गीता मैं भगवान क्रष्ण ने अध्यात्म ज्ञान को ही ज्ञान कहा है वाकी सब अज्ञान । नैतिक शिक्षा के पक्षधर नैतिक शिक्षा को ही ज्ञान कहते हैं । नैतिक शिक्षा संस्कारों से भी मिलती है । संस्कार पुर्व जन्म से भी होते हैं । जीवन एक कला है कैसे उत्तम जीवन जी सकले हैं यह चतुर लोग ही जानते हैं । उनके लिए डिग्रीयां हासिल कर लेना भी एक कला ही है । नौकरी या व्यवसाय ,राजनीति भी एक कला ही है । शिक्षा की परिभाषा अपने क्षेत्र मैं प्रवीण होना ही है । यदि आप अपने क्षेत्र मैं प्रवीण हो चुके हैं तो आप उस क्षेत्र के शिक्षित हैं । जैसे हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्रमोदी जी । ओम शांति शांति शांति 

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

आज जब अमेरिकी राष्ट्रपति भारत दौरे पर है..निश्चय ही पडोसी देश की नजरें ..रिश्तें की गर्माहट को देख बार-बार बेचैन होंगी ! नवाज साहब की नींदें हराम हो जाएँगी..लेकिन देखना महत्पूर्ण होगा की इस दौरे में भारत-अमेरिकी की बढ़ती नजदीकियों से पाकिस्तान की हरकतें कितनी सुधरती है? क्या पाकिस्तान समय की चाल को समझ पायेगा ? सीमापार से लगातर आ रहीं गोलीबारी की खबरें ..क्या बदलेंगी? उम्मीद तो की जानी चाहिए अभिषेक जी नहीं तो ओबामा के साथ इतनी गर्मजोशी का फायदा क्या होगा... उम्मीद पर दुनिया कायम है वैसे पाकिस्तान को चेतावनी अमेरिका की तरफ से भी दी जाने लगी है...कही न कहीं भारत का पक्ष मजबूत दीख रहा है...

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: K.Kumar 'Abhishek' K.Kumar 'Abhishek'

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा:

जे.एल सिंह जी, बड़े भैया ....सादर नमस्कार! बधाई मुझे नहीं आपको मिलनी चाहिए...इस आलेख के लिए! ...........आपको जानकर आश्चर्य होगा कि, इस आलेख के निर्देशक तो आप ही हैं! आपने एक दिन फेसबुक पर एक आलेख प्रकाशित किया था, वह आलेख लेखकों के एक बड़े मंच से लिया गया था.....मैंने भी सोचा कि बड़े अनुभवी साहित्यकार हैं यहाँ...इनकी सोहबत में मेरी धार भी निखार जाएगी! मैंने उस मंच पर अपना प्रोफाइल बना लिया, लेकिन कुछ ही दिनों में जो मुझे महसूस हुआ....उसका वर्णन इस आलेख में हैं! वहां ऐसा लगा जैसे लोगों ने अपनी एक अलग ही दुनिया बसा ली हैं...बाहरी दुनिया से कोई तालुक्कात ही नहीं थे! वास्तव में साहित्य समाज का नैतिक मार्गदर्शन करता हैं, आज समाज के जो हालत हैं...उसके लिए साहित्य का उद्देश्यहीन होना भी एक बड़ा कारन हैं!

के द्वारा: KKumar Abhishek KKumar Abhishek

आदरणीय रविन्द्र कुमार जी, सादर नमन ! बड़े भैया...ये आलेख पिछले कुछ दिनों हुए एक अनुभव पर आधारित है! मैं एक ऐसे समूह के बीच फंस गया था, जहाँ सामाजिक सरोकार से जुडी रचनाओं के लिए कोई जगह नहीं बन पा रही थी, बड़े-बड़े नाम अपनी मनोरंजक रचनाओं के आदान-प्रदान में व्यस्त थे! मेरे आलेख पर कुछ लोग "प्रसंशा" कर भी रहे थे...तो उसका कारन ये था की मैं भी उनकी रचनाओ पर टिप्पड़ी कर सकूँ! मुझे लगा मैं किसी जेल में कैद हो गया हौं...जहाँ कुछ कैदी रहते हैं.....उन्हें बहरी दुनिया से मतलब ही नहीं....क्योकि उनकी अपनी एक दुनिया बदल गई है! उस समय मेरे मस्तिष्क में जो सवाल उपजे...उसके जवाबों की तरफ ध्यान दिलाने का प्रयास मैने अपने आलेख में किया है! .....जब तक साहित्य के जनता की भावनाओं को नहीं छुएगा....जब तक हमारी रचनाएँ जनता के लिए नहीं होंगी....साहित्य का उदेश्य पूरा नहीं हो सकता हैं! ....बड़े भैया, एक बार पुनः मेरे आलेख को नए नजरिये से पढ़े...निश्चय ही मेरे सवाल ....आपको एक गंभीर मंथन को उत्सुक करेंगे! ...धन्यवाद...!!

के द्वारा: KKumar Abhishek KKumar Abhishek

के द्वारा: jlsingh jlsingh

१९९१ में जब वे पी वी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में वित्त मंत्री बनाया गया था ... वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ ने उनसे साल किया था - डॉ. मनमोहन सिंह को राजनीति आती है?..उनका सरल जवाब था - सीख रहा हूँ... पर उन्होंने अपने ईमानदारी और सत्यनिष्टः का चोला नहीं उतारा.. हाँ कभी कभी कड़े फैसले लेने से नहीं चूके ...बेचारे करते भी क्या कभी लोक सभा का चुनाव लड़ा नहीं ..सोनिया के कृपा पात्र बने रहे . हाँ उन्होंने अपने अंतिम प्रेस कांफ्रेंस में कहा था - इतिहास उन्हें याद करेगा ...आप भी वही कह रहे हैं...इतिहास ऐसे व्यक्ति को याद जरूर रक्खेगा ...पर क्या फायदा? लोग ऐसे लोगों से सीख तो लेते नहीं...पाठ्य पुस्तक की चीज बनकर रह जाते हैं.... बहुत अच्छी विवेचन लिखते हैं आप लिखते रहें...सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट




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