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युवा भारत की दमदार आवाज : के.कुमार 'अभिषेक'

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एक पोलिटिकल ड्रामा : 'नितीश बनाम मांझी'

Posted On: 17 Feb, 2015 Others में

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बिहार की प्रादेशिक राजनीति में कई बड़े-बड़े ‘पोलिटिकल ड्रामों’ का एक लम्बा इतिहास रहा हैं, कई बार सत्ता के संघर्ष में लोकतान्त्रिक मर्यादाओं की बलि दी गयी है….लेकिन पिछले १५ दिनों से बिहार में चल रही राजनीतिक ड्रामेबाजी …बिहार के राजनैतिक इतिहास में एक नया अध्याय है! सामान्यतः एक दर्शक के दृष्टिकोण से किसी भी ‘ड्रामे’ (नाटक) में नायक और विलेन सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन एक विश्लेषक के दृष्टिकोण में निर्माता/निर्देशक और ‘पटकथा लेखक’ ज्यादा अहमियत रखते हैं! पिछले १५ दिनों से चल रहे बिहार के हाई-वोल्टेज ‘पोलिटिकल ड्रामे’ में यह बात स्पष्ट हो चुकी है की ..इस ड्रामेबाजी के नायक बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री श्री जीतराम माझी हैं, वहीँ विलेन की मुख्य भूमिका में पूर्व मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार हैं..लेकिन अब भी यह महत्पूर्ण प्रश्न बना हुआ हैं की इस सम्पूर्ण नाटक के निर्माता/निर्देशक और पटकथा लेखक कौन हैं? कौन है, जो परदे के पीछे से इस नाटक को संचालित कर रहा है ? किसके इशारों पर ‘नायक’ अपना अभिनय प्रदर्शित कर रहा हैं? इन सवालों का जवाब ढूढ़ने से पहले इस ‘ड्रामेबाजी’ की पटकथा को समझना होगा!
१६ मई २०१४, कांग्रेस के १० वर्षों के कुशासन का अंत, और लोकसभा चुनावों में श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्वा में ‘भाजपा’ की ऐतिहासिक विजय! लोकसभा चुनाव की अप्रत्याशित आंधी में जहाँ देश की कई बड़ी पार्टियां उड़ गयी, वहीँ चुनाव से ठीक पहले ‘भाजपा’ से गठबंधन तोड़ने वाले जनप्रचलित ‘सुशासन बाबू’ की पार्टी की बिहार में करारी हार..ने बिहार की राजनीति में भूचाल ला दिया ! पार्टी का अंतर्कलह जब तक बाहर आता.. नितीश कुमार ने हवा के दबाव को पहचाना..और हार की जिमेदारी लेते हुए १७ मई २०१४ को मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया ! लेकिन जाते-जाते उन्होंने ‘दलित मुख्यमंत्री’ का ऐसा कार्ड खेल..जिसने सम्पूर्ण राजनीतिक जगत को हतप्रभ कर दिया! कभी ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी को अपने पद पर बैठा, सम्मान देने वाले नितीश कुमार ने …. ‘श्री जीतन राम मांझी’ को बिहार का नया मुख्यमंत्री प्रस्तावित किया! हालाँकि श्री नितीश कुमार ने हमेशा समाज के पिछड़े वर्गों की लड़ाई लड़ी, मुख्यमंत्री रहते हुए दलित/महादलितों के उत्थान के लिए कई मजबूत प्रयास किये…बावजूद इसके ‘महादलित मुख्यमंत्री’ की उनकी चाल..’दलित प्रेम’ से ज्यादा ..अपने फिसल चुके वोटबैंक को हासिल करने का एक प्रयास था ! नितीश कुमार की इस अप्रत्याशित चाल से घबराई ‘भाजपा’ ने श्री जीतन राम मंझी को ‘रिमोट कंट्रोलड’ मुख्यमंत्री कहना प्रारम्भ कर दिया …लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया..’श्री मांझी’ की प्रशासनिक कार्यशैली ने ‘भाजपा’ के दावों को गलत साबित कर दिया! उनकी कार्यशैली श्री नितीश कुमार की नीतियों से काफी अलग थी! श्री जीतनराम मांझी एक तरफ जहाँ ‘दलितों के उत्थान’ के प्रयास में लगे थे ..वहीँ समाज के अन्य वर्गों को चिढ़ाने का कोई मौका भी नहीं छोड़ रहे थे! सर्वाधिक अजीब तो यह की ‘श्री मांझी’ अपने कामों से ज्यादा अपने ..अनावश्यक उट-पटांग ब्यानो के लिए सुर्खिया बटोरने लगे ! वे कभी व्यापारियों को हलकी-फुलकी कालाबाजारी की छूट देते नजर आये, तो कभी दलितों/मजदूरों को शाम को ‘शराब’ पिने की सलाह देते, कहीं मंदिर धुलवाने की बात कर बवाल खड़ा कर दिया ..तो कहीं कमीशन खाने-खिलाने की बात भी स्वीकारी ! राजनीतिक रूप से भी उनके ब्यान समझ से परे थे,..किसी मंच से वे नितीश कुमार को अगला मुख्यमंत्री बताते थे, वहीँ अगले ही दिन वे घोषणा करते थे की अगला मुख्यमंत्री भी दलित ही होना चाहिए! स्पष्ट है की श्री जीतन राम मांझी ‘पार्टी’ और ‘नितीशकुमार’ से लगातार ‘बे-लगाम’ होते जा रहे थे! इस स्थिति से पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में असंतोष व्याप्त होने लगा …इधर ‘जद-यु’ नेतृत्वा भी इस स्थिति से असहज महसूस करने लगा था..लेकिन कोई बड़ा फैसला लेना बेहद मुश्किल था! जिस ‘जीतन राम माझी’ के बलबूते ‘जद-यू’ पिछड़े वर्गों का वोटबैंक खुद का समझने लगा था, चुनावी वर्ष में ‘श्री मांझी’ को मुख्यमंत्री पद से हटाने का जोखिम नहीं उठा सकता था! इधर ‘श्री मांझी’ सुधरने के मूड में बिलकुल नहीं थे, .. उन्होंने पार्टी नेतृत्वा से विद्रोह कर दिया. और धीरे-धीरे भाजपा नेताओं के सम्पर्क में भी आने लगे ! इस स्थिति का भाजपा ने बेहद खूबसूरती से फायदा उठाया..और मांझी के भीतर ‘पार्टी नेतृत्वा’ के प्रति विद्रोह की ज्वाला को भड़काने का कार्य किया ! लाख कोशिशों के बावजूद जब ‘श्री मांझी’ मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार नहीं हुए, जद-यू ने बड़ा फैसला किया और नितीश कुमार को ‘विधानमंडल दल’ का नया नेता चुन लिया गया , साथ ही वर्तमान मुख्यमंत्री को ६ वर्ष के लिए पार्टी से निलंबित भी कर दिया गया! प्रादेशिक गठबंधन के अनुसार ‘राजद’ ‘कांग्रेस’ और कम्युनिस्ट पार्टी ने भी नितीश कुमार के नेतृत्वा में नयी सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया ! इधर मांझी अपनी कुर्सी बचाने के लिए,.. खुल के ‘भाजपा’ के शरण में आ गए! अब चूँकि राज्यपाल महोदय ने वर्तमान मुख्यमंत्री श्री जीतन रन मांझी को २० फ़रवरी को सदन ने अपना बहुमत साबित करने की चुनौती दी है, अहम प्रश्न है , क्या भाजपा ‘मांझी सरकार’ को समर्थन देने के लिए तैयार है?
इसके कोई शक नहीं की मांझी सरकार को अस्थिर करने में भाजपा नेताओं की परदे के पीछे से बड़ी भूमिका रही है..और सही अर्थों में भाजपा ही बिहार में चल रहे ‘पोलिटिकल ड्रामे’ की निर्माता/निर्देशक है! बावजूद इसके अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है की भाजपा ‘मांझी सरकार’ को सहारा देगी या, नहीं! वास्तविक हकीकत है की..भाजपा नेतृत्वा भी ‘श्री मांझी’ के बड़बोलेपन को लेकर चिंतित है, उन्हें भी इस बात का डर है की ‘चुनावी वर्ष’ में अपने बेलगाम ब्यानो और कार्यशैली से ‘श्री मांझी’ पार्टी की नैया डुबो सकते हैं …साथ ही जनता में यह नकारात्मक सन्देश जाने का खतरा भी दिख रहा है कि, ‘भाजपा’ ने ‘श्री मांझी’ के विद्रोह को हवा दी थी! सवाल बड़ा है की जो व्यक्ति ‘नितीश कुमार’ और ‘जद-यू’ को ठेंगा दिखा सकता है, क्या गारंटी है की ‘भाजपा’ के साथ ऐसा नहीं करेगा? बावजूद इसके ‘भाजपा’ की नजर बड़े दलित वोटबैंक पर भी है और इस स्थिति में भाजपा ‘वेट एंड वाच’ की भूमिका में ज्यादा बेहतर महसूस कर रही है ! स्पष्ट है कि, कहीं न कहीं भाजपा भी ‘मांझी सरकार’ गिरने की कामना कर रही है, शक्ति परिक्षण में भाजपा की रणनीति होगी की ‘भाजपा विधायक’ मांझी सरकार के समर्थन में वोट करें..लेकिन श्री मांझी अन्य ३० विधायक न जुटा सकें ! ऐसे में माझी सरकार गिर जाएगी..और उट-पटांग ब्यानो का खतरा टल जायेगा..वहीँ ‘दलित समर्थक’ का तमगा भी ‘भाजपा’ को हासिल हो जायेगा! हालाँकि विशेष परिस्थिति में ‘राष्ट्रपति शासन’ का विकल्प भी भाजपा देख रही है!
अगर हम इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को ‘श्री जीतन राम मांझी’ को संदर्भ में देखें तो…तो यह कहना गलत नहीं होगा कि, अति-उत्साह में वे अपनी जमीं गवां चुके है! वे भूल गए कि..वे निर्वाचित नहीं, प्रस्तावित मुख्यमंत्री है ! श्री नितीश कुमार के सामने कई विकल्प रहे होंगे …लेकिन उन्होंने श्री मांझी पर अपना विश्वास व्यक्त किया, लेकिन आज उस विश्वास पर खरा उतारना तो दूर, ‘दलित मुख्यमंत्री’ के फैसले पर ही सवाल खड़ा हो गया है! साथ ही पार्टी नेतृत्वा को ठेंगा दिखा, जिस तरह से उन्होंने कुर्सी के लोभ में अपने विरोधियों से हाथ मिलाये है, जिस तरह वे घबराहट में लगातार ‘भाजपा’ नेताओं के चौखट चुम रहे हैं…मुझे नहीं लगता की यह दलित वर्ग के लिए गर्व करने वाली स्थिति है! आज अगर ‘श्री मांझी’ यह प्रश्न उठा रहे हैं की ‘नितीश कुमार’ उन्हें अपने इशारों पर नचाना चाहते थे, प्रश्न अहम है, क्या ‘भाजपा’ उन्हें बेलगाम छोड़ देगी? भाजपा के सर्वाधिक विधायकों के साथ सरकार चलाते हुए, क्या वे स्वतंत्रता के साथ फैसले ले सकेंगे? मुझे लगता है की श्री मांझी ने राजनीतिक जगत में अपना विश्वास खोया है,.और २० फ़रवरी उनके राजनीतिक जीवन का सबसे अहम दिन होने वाला है!
जहाँ तक प्रश्न श्री नितीश कुमार का है, इसमें कोई शक नहीं की वर्तमान राजनीतिक स्थिति में उनकी बेदाग छवि बेहद धूमिल हुई है, उनके पिछले कई बड़े फैसले पार्टी के लिए असफल साबित हुए है ! भाजपा से गठबंधन तोड़ने की उनकी जिद्द ..उनकी अपनी पार्टी में सर्वमान्य नहीं थी…साथ ही वर्तमान राजनैतिक ड्रामें के सूत्रधार भी वही है! हालाँकि उन्होंने हमेशा समाज के निचले तबके को आगे बढ़ाया..ऐसे में दलित मुख्यमंत्री का फैसला गलत नहीं था , लेकिन आज जो परिणाम दिख रहे हैं, आसानी से उस फैसले को गलत कहा जा सकता है! ८ वर्ष के अपने कार्यकाल में बिहार को पटरी पर ला..विकास की गति देने वाले सुशासन बाबू की ‘सफलता एक्सप्रेस’ पटरी से उतर गयी है! वर्तमान परिदृश्य में उनकी कोशिस उसे पुनः पटरी पर लाने ..और फैसलों को सुधारने की दिख रही है! आज बिहार में एक नयी राजनीति शुरू हुई है, जिसके सूत्रधार भी श्री नीतिश कुमार ही हैं! देखना दिलचस्प होगा की..जिस राजद और कांग्रेस विरोध की राजनीति से प्रादेशिक सत्ता के शिखर पर पहुंचे…उनके साथ गठबंधन जनता को कितना पसंद आता है! वर्तमान राजनीतिक ड्रामे में श्री नितीश कुमार के पास खोने को ज्यादा कुछ नहीं है,,उनकी असली अग्नि परीक्षा ‘विधानसभा चुनाव’ होंगे ! देखना दिलचस्प होगा की ..भाजपा से गठबंधन तोड़ने, ‘ महा दलित मुख्यमंत्री बनाने’, उसी महादलित मुख्यमंत्री को सत्ता से बेदखल करने..और राजद, कांग्रेस जैसी विरोधी पार्टियों के साथ गठबंधन को…प्रदेश की आम जनता कैसे लेती है!

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
February 17, 2015

बहुत अच्छा विश्लेषण भाईसाहब ,राजनीतिक मंचों पर ज्यादा बोलना हितकर नहीं होता |

jlsingh के द्वारा
February 17, 2015

बहुत ही सटीक विश्लेषण कुमार अभिषेक जी! भाजपा भी अब फूंक-फूंक कर कदम रखनेवाली है, दिल्ली परिणाम के बाद!


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