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युवा भारत की दमदार आवाज : के.कुमार 'अभिषेक'

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जातिवाद बनाम राष्ट्रवाद

Posted On: 20 Sep, 2015 Others,social issues में

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सादर सुप्रभात, हमारे देश में राष्ट्रिय एकता और अखंडता को लेकर बड़े-बड़े दावे किये जाते हैं,लोकतांत्रिक मूल्यों की कसमें खायी जाती हैं..लेकिन जमीनी हकीकत हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा की हवा निकाल देती हैं! ..राष्ट्रिय एकता की मिशाल देखिये …आज अगर आप १२५ करोड़ भारतीयों के हित में बात करते हैं, सम्पूर्ण भारत को आह्वाहन करते हैं…मुश्किल से कुछ हज़ारों की भीड़ इकठ्ठा हो पाती हैं…लेकिन इसी देश में एक ऐसा युवा जिसके पास अपनी कोई वैचारिकता नहीं हैं, जिसके विचारों को किसी भी दृष्टिकोण से समझदारी पूर्ण नहीं कहा जा सकता है…सिर्फ एक जाति विशेष का सोया स्वार्थ जगा…ऐतिहासिक भीड़ जमा कर लेता हैं! स्पष्ट हैं की इस देश में जाति-धर्म …हमारी राष्ट्रीयता से बड़े ब्रांड बन चुके हैं.! लोगों की जातिगत भावनाएं ….राष्ट्रिय भावनाओं से ज्यादा प्रभावशाली है! निश्चय ही यह बेहद चिंतनीय विषय हैं…विशेषकर तब, जब हम इक्कीसवीं सदी में सामाजिक परिवर्तन की बात कर रहे हैं…राष्ट्र को एकसूत्र में पिरो विश्वगुरु का दर्जा दिलाने की बात कर रहे हैं! हमें सोचना होगा की क्यों जातिगत भावनाएं …राष्ट्रिय महत्व पर भारी पड़ रही हैं? जो लोग देश के लिए कभी बाहर नहीं निकलते हैं…वे कैसे जातिगत स्वार्थ के लिए आधी रात को सड़कों पर आ जाते हैं? कैसे कुछ लोग..जो वैचारिकता से समाज के लिए खतरा हैं…सिर्फ जाति का नाम लेकर मशीहा बन जाते हैं ?

बात सिर्फ गुजरात के पटेल आंदोलन की नहीं हैं…अपितु पिछले दो दशको में देश के कई हिस्सों में होने वाले जाति और धर्म आधारित आंदोलन बड़े प्रभावी रहे हैं ! राजस्थान में गुर्जरों और जाटों का आंदोलन भारतीय अखंडता की परिभाषा की मजाक बनता रहा हैं! ..देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले दलित और आदिवासियों के आंदोलन भी कम प्रभावशाली नहीं हैं..! दशकों से देश का एक बड़ा हिस्सा नक्सलवाद से प्रभावित रहा हैं…इनका हिंसक आंदोलन जो सभ्य समाज के लिए किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं हैं,..बावजूद इसके सत्य यह भी हैं की हमारे समाज का बड़ा तबका इनका समर्थन करता है ! प्रतिशोध की ज्वाला में भड़कती इनकी बातें भी लोगों को बेहद पसंद आती हैं.! ..इनकी मांगे जायज हैं या नाजायज …यह एक अलग विषय हैं?…लेकिन इतना तय है कि, ये सभी आंदोलन राष्ट्रीयता के बैनर तले नहीं हुए हैं…अपितु इन सभी आंदोलन का आधार जातिगत और वर्गीय दृष्टिकोण ही हैं! इसके विपरीत देश की कई बड़ी राष्ट्रिय महत्व की समस्याएं, लगातार बद से बदतर होती चली जा रही हैं! .गरीबी, बेरोजगारी, बढ़ते अपराध, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, भ्रष्टाचार, अन्धविश्वास, भूर्ण हत्या , दहेज़ प्रथा,.. जैसे ऐसे दर्जनों विषय जो १२५ करोड़ भारतीयों को प्रभावित करते हैं ,ऐसे विषयों पर किसी को बात करना भी गंवारा नहीं हैं…और अगर कुछ लोग बात करने की कोशिस भी कर रहे हैं…कोई उनकी सुनने वाला नहीं हैं! हकीकत यही की लोगों को जाति के दायरे में ही अपना स्वार्थ दिखता हैं…उनके लिए राष्ट्रीयता का कोई औचित्य नहीं है!

आज हम भले ही समाज के शिक्षित होने के कितने भी दावे कर लें….शिक्षा के प्रभाव से जातिवाद कि टूटती दिवारों का झूठा दंभ भर लें..हकीकत यही हैं कि, इस देश में कोई भी सिर्फ जाति का नाम लेकर लोगों को भेड़-बकरियों की तरह इकठा कर सकता हैं..और देखते ही देखते उनका स्वघोषित नेता भी बन सकता हैं! अर्थात इस देश में खुद का परिचय स्थापित करने के लिए जाति-धर्म सबसे आसान रास्ते हैं …और कुछ बेहद चालक और महत्वकांक्षी प्रवृति के लोग इसका फायदा भी उठा रहे हैं ! आधी रात को भी आप किसी को जाति और धर्म के नाम पर बाहर निकाल सकते हो…लेकिन देश के नाम पर बाहर निकालना मुश्किल है! यह स्थिति तब और दुर्भाग्यपूर्ण हो जातीं हैं…जब हमारे राजनेता चुनावों में जातियों का नाम ले-लेकर वोट मांगते हैं…और लोग नेताजी की सभी गुणों/अवगुणो को भुला सिर्फ जातिगत पहचान के आधार पर वोट दे देते हैं! लोगो के लिए चिंतन का विषय ही नहीं हैं कि..नेताजी चुनाव जीत कर समाज के लिए क्या कार्य करेंगे? कहीं वे भी अपनी झोली तो भरने नहीं लग जायेंगे.?..उन्हें तो ख़ुशी इस बात में ही मिल जाती हैं कि, अपनी जाति का विधायक/सांसद है! देश बने या बिगड़े…राष्ट्र का विकास हो या न हो….उन्हें फ़िक्र नहीं….अपनी जाति उन्हें ज्यादा गौरवान्वित करती हैं!
वास्तव में यह बेहद ही शर्मनाक स्थिति हैं ! राष्ट्र और राष्ट्रिय महत्व के विषयों को ज्यादा तवज्जों देने कि जरुरत हैं ! जाति-धर्म के नाम पर मांगे जायज हो,…नाजायज हो…इस हद तक हिंसक नहीं होना चाहिए कि राष्ट्र का नुकसान हो ! इस देश से जातिवाद समाप्त करने के लिए…हमें राष्ट्रवाद कि भावना को प्रभावशाली तरीके से जागृत करना ही होगा ! हम सभी भारतीय हैं…भारतीयता हमारे व्यक्तित्व कि सबसे बड़ी पहचान हैं…जाति-धर्म जैसे सामाजिक विखंडन के आधारों को व्यक्तित्व का परिचय बनाना संकीर्ण मानसिकता का परिचायक हैं! वास्तव में यह एक ऐसी समस्या हैं…जिसके लिए हम सभी जिम्मेदार हैं! हर वह भारतीय जिम्मेदार हैं…जिसे अपनी भारतीयता का अहसास नहीं..जो कुछ लोगों कि स्वार्थी चालबाजी में उलझ अपने ही देश में आग लगा रहा हैं! इस समस्या के निवारण के लिए भी हम सब को ही जिमेदारी लेनी !

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
September 20, 2015

बात तो आपकी शत प्रतिशत जायज है. इस पर बहस होती रही है, पर नतीजा अभीतक हासिल नहीं हुआ. दूसरी तरफ जाति को पूर्णत: समाप्त करने की भी तो बात नहीं हो रही न! जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रीयता गंभीर समस्या बनती जा रही है . बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों को इस पर विचार करनी चाहिए पर राजनीतिज्ञ तो जहाँ अपना फायदा देखते हैं, वहीं अपनी रोटी सेंकने लगते हैं. नहीं तो क्या जरूरत थी प्रधान मंत्री को अपनी जाति OBC बताने की, अमित शाह को यह कहने की कि भाजपा ने सबसे अधिक OBC मुख्य मंत्री और प्रधान मंत्री दिए हैं. अभी बिहार में टिकट देते वक्त हर क्षेत्र में जातियों के हिशाब से ही टिकट दिए जा रहे हैं, चाहे वह किसी भी पार्टी में हो. अत: इस पर बात तभी तक उचित जान पड़ती है जब तक अपना हित साधित होता रहे. सबके लिए योग्यता के अनुसार उचित और सामान अवसर देने की बात ही क्यों न की जाय? पिछड़े और दलित लोगों को अधिक से अधिक सुविधा देना अलग बात है पर उसे सुविधाभोगी बनाना गलत बात है. बाकी आप सब समझते हैं.


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