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युवा भारत की दमदार आवाज : के.कुमार 'अभिषेक'

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हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

Posted On: 11 Feb, 2016 Others,social issues में

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एक भारतीय होने के नाते, भारतीय समाज मे व्याप्त भ्रष्टाचार हमारी चिंता का विषय हो सकता हैं, लेकिन सच तो यह हैं कि,आज भ्रष्टाचार सम्पूर्ण वैश्विक समाज कि सबसे बड़ी विकृति के रूप मे चुनौती बनता जा रहा हैं! ऐसे मे कहीँ न कहीँ एक अहसास उभरता हैं कि, जिस तेजी से सम्पूर्ण विश्व विकास कि दौड़ लगा रहा हैं, दुष्प्रभाव के रूप मे जन्म लें रही ख़ुदगर्जी और “पाने ” के लिये किसी भी हद तक जाने कि सोच भ्रष्टाचार कि बड़ी वजह हैं ! लोगों को आगे बढ़ना हैं, ऐसे मे ईमान और उसूलों कि बेडीयां खटकती हैं! वह दौर बीत गये, जब व्यवहारिकता और मानवीय मूल्यों के पैमानों पर “सफल इंसान” का परिक्षण होता था ! आज सफल इंसान कि परिभाषा आर्थिक सम्पन्नता मे अंतर्निहित हो चुकी हैं !

जैसा की हम सभी जानते हैं, भ्रष्टाचार आज हमारे देश का भी सबसे ज्वलंत मुद्दा हैं! एक ऐसी बीमारी, जो लगातार हमें वैश्विक परिदृश्य में कमजोर कर रही हैं…बावजूद इसके हम इलाज नहीं ढूंढ पायें हैं! हाँ, इलाज कि अनेकों कोशिशे हुई हैं…लेकिन हम रोग कि जड़ में नहीं पहुंच पायें हैं! देश में बड़े-बड़े आंदोलन, जुलुस प्रदर्शन हो रहे हैं…हर देशवासी भ्रष्टाचार पर चिंतिंत हैं, बावजूद इसके आज भी हमारा चिंतन भ्रष्टाचार की जड़ों में नहीं पहुंच सका हैं! वास्तव में हमारा भ्रष्टाचार कि जड़ों में न जाना, कमजोरी से ज्यादा…मज़बूरी भी बन चुका है..क्योंकि अंगुली खुद पर भी उठ जाने का डर बना हुआ है ! हकीकत यह हैं कि आज भ्रष्टाचार हमारी जीवनशैली का हिस्सा बन चुका हैं, और चाहें-अनचाहें हम सभी इस में लिप्त हो रहे हैं! बातें होती हैं भ्रष्टाचार पर,… दूसरों को भला-बुरा सुनाते हैं, लेकिन बड़ा प्रश्न यह हैं कि, कब तक हम उस भ्रष्टाचार को नजरअंदाज करेंगे जो हमारी जीवनशैली का हिस्सा हैं, एक आम आदमी के जीवनशैली का हिस्सा हैं?.. ‘जीवन के किसी मोड़ पर अगर हम भ्रष्टाचार से पीड़ित होते हैं, तो मौके मिलते ही कई बार हम फायदे भी उठाते हैं” ! समस्या यह रहीं हैं कि, जब दूसरों को मौका मिल जाता हैं तो भ्रष्टाचार लगता हैं, जब खुद का मौका लग जाता हैं, तो हमें शिष्टाचार लगने लगता हैं ! भ्रष्टाचार के प्रति यह दोहरा नजरिया हि, अब तक के असफल संघर्षों की बड़ी वजह रहा हैं !
कहते हैं सच कड़वा होता हैं, लेकिन कड़वी तो दवा भी होती हैं! रोगों से मुक्ति एवं स्वस्थ शरीर के लिये हमें कड़वी दवाओं का घूंट पीना हि पड़ता हैं ! “कारण-अकारण, परिस्थितिजन्य मजबूरीवश हम सभी के जीवन मे भ्रष्टता अपनी जड़ जमा चुकी हैं” ! अगर हम इस सत्य को स्वीकार नही कर सकते, हमें भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कुछ बोलने का हक नही हैं! अगर हम अपनी कमियों/खामियों को स्वीकार करने का माद्दा नही रखते, हमें दूसरों कि कमियों पर हो-हल्ला मचाना बंद करना चाहिए ! सामाजिक बुराइयों मे सुधार के लिये, नेता नही जिम्मेदार नागरिक बनने कि आवश्यकता हैं ! मुझे बेहद दुर्भाग्य के साथ कहना पड़ रहा हैं कि, अब तक भ्रष्टाचार के प्रति हमारा चिंतन सिर्फ और सिर्फ पीड़ित का प्रलाप रहा हैं! एक समग्र और गंभीर चिंतन कि जगह हम सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप में उलझ कर रह गए हैं !

अगर हम आधुनिक जीवनशैली को एक निस्पक्ष दृष्टिकोण से समझ सकें,…ये सही हैं की आज हम सभी के जीवन में भ्रष्टाचार प्रभावी हैं लेकिन इस हालात के लिए खुद को या किसी व्यक्ति विशेष को आरोपित करना भी पूर्ण विराम नहीं हैं ! वास्तव में आज हमारे परिवार और समाज में ऐसे हालात बनते जा रहे हैं, जहाँ ईमानदारी और शिष्टता के साथ जीवन लगभग असंभव होता चला जा रहा है ! एक ऐसा दमघोंटू वातावरण तैयार हो चूका हैं,… जहाँ पग-पग पर भ्रष्टाचार से सामना करना पड़ता हैं..ऐसे में जीवन पथ पर अपना औचित्य और रफ़्तार बनाये रखने के लिए व्याप्त माहौल से समझौता मज़बूरी बन जाता हैं! कई बार ऐसे हालात बनतें हैं, जब जीवन संघर्ष मे खुद या परिवार को बचाने कि जद्दोजेहद मे विकल्पहीनता का अहसास होता हैं, तब हम मजबूरन ही सही जीवन संघर्ष मे खुद को बचाये रखने कि गरज से भ्रष्टाचार का दामन थाम हि लेते हैं! जब जीवन कि नाव बिच समुन्द्र मे फँस जाती हैं, स्थापित उसूल और मर्यादायें भी बोझ लगती हैं! व्यवस्था में व्याप्त “खाओं और खाने दो” के माहौल से बचना मुश्किल हो चुका हैं !

वास्तव में अगर हम सही मायनों में देश और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के प्रति चिंतित हैं, और हालात में सुधार की कामना रखते हैं, मुझे लगता हैं हम सभी को थोड़ी ईमानदारी दिखानी होगी और उस सत्य को स्वीकार करने होगा….जिससे हम सभी चेहरा छुपाते रहे हैं ! किसी भी रोग का कारण ढूंढने से पूर्व …रोगी को ढूंढा जाता हैं…ठीक इसी तरह भ्रष्टाचार जैसी अब तक लाइलाज बीमारी का कारण ढूंढने से पूर्व हमें यह स्वीकार करना होगा की, हम सभी इस रोग से ग्रस्त हो चुके हैं! भ्रष्टाचार का वायरस हमारी व्यवस्था में लगातार जड़ जमाता चला जा रहा हैं और दुर्भाग्य से हम राजनैतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के कुछेक आर्थिक भ्रष्टाचार के मामलों में ही चिंतित हैं ! यहाँ भी पैसा महत्पूर्ण हो जाता हैं, क्योंकि हमारे देश और समाज में सिर्फ और सिर्फ आर्थिक भ्रष्टाचार को ही ‘भ्रष्टाचार’ माना जाता हैं…जबकि भ्रष्टाचार की परिभाषा हर इंसानी “भ्रष्ट आचरण” को अपने अंदर समेटे हुए हैं! वास्तव में हमें बेहद जिमेदारी और गंभीरता के साथ व्यक्ति,परिवार और समाज में व्याप्त भ्रष्ट आचरण को स्वीकार करते हुए …समग्र और निष्पक्ष चिंतन करना होगा ! व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के माहौल से बाहर निकल…सामूहिक जिमेदारी को स्वीकार करते हुए …. माहौल के प्रति चिंतनशील होना होगा ! कौन भ्रष्ट हैं? और कौन शिष्ट हैं ? ऐसे प्रश्नों से जितनी जल्दी हम बाहर निकल सकें…..बेहतर होगा …और तभी हम अपने निजी जीवन,परिवार, समाज और राष्ट्र में फैली भ्रष्टता के विरुद्ध एक निर्णायक और परिणामी संघर्ष की पृष्टभूमि रख सकते हैं, अन्यथा समय व्यतीत करने के लिए, …जो होता आया हैं, वह सही हैं !



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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bhagwandassmendiratta के द्वारा
February 11, 2016

कुमार अभिषेक जी मनन कि आज अपने कुटुंब में भी अधिकतर सदस्य आधुनिकता के दबाव में गिरते मूल्यों का दामन थाम चुके हैं परन्तु मानव मूल्यों से पूरी तरह दूर हो जाना हमारी संस्कृति कभी नहीं रही और न ही शत प्रतिशत सदस्यों ने इसे स्वीकारा है| थोड़ी निराशा तो है पर अभी उम्मीद टूटी नहीं है | अलबत्ता आपकी लेखन शैली व् भाषा कोष सराहनीय हैं | बहुत बहुत साधुवाद|

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
February 17, 2016

अभिषेक जी साप्ताहिक सम्मान के लिए बधाई । भ्र्ष्टाचार पर अच्छा लिखा है । जब तक हम स्वयं नही सुधरेंगे यह बीमारी बनी रहेगी । हमे पहले अपने को देखना होगा । जिस दिन हम ऐसा कर पायेंगे भ्र्ष्टाचार खत्म होने लगेगा ।  

jlsingh के द्वारा
February 18, 2016

एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी आलेख और साप्ताहिक सम्मान के लिए बहुत बहुत बधाई! चिंतन मनन हम सबको करने की जरूरत है और जरूरत है पारदर्शिता की. तकनीक बहुत कुछ आ गए हैं पर हमरी नैतिकता को न जाने क्या हो गया है? हम कब ‘परहित सरिस धरम नही भाई’! की अवधारणा को मानने लगेंगे. बहरहाल आपका चिंतन सार्वजनिक मंच पर अवश्य दिखाना चाहिए ताकि लोग कुछ प्रेरणा ग्रहण कर सकें. फिर से एक बार बधाई!

Bhola nath Pal के द्वारा
February 18, 2016

” हमारे देश और समाज में सिर्फ और सिर्फ आर्थिक भ्रष्टाचार को ही ‘भ्रष्टाचार’ माना जाता हैं…जबकि भ्रष्टाचार की परिभाषा हर इंसानी “भ्रष्ट आचरण” को अपने अंदर समेटे हुए हैं! वास्तव में हमें बेहद जिमेदारी और गंभीरता के साथ व्यक्ति,परिवार और समाज में व्याप्त भ्रष्ट आचरण को स्वीकार करते हुए …समग्र और निष्पक्ष चिंतन करना होगा “अभिषेक जी ! मैं सहमत हूँ …………

Shobha के द्वारा
February 19, 2016

श्री अभिशेख जी पहले बधाई इसके बाद में लेख पर प्रतिक्रिया बहुत अच्छा लेख “व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के माहौल से बाहर निकल…सामूहिक जिमेदारी को स्वीकार करते हुए …. माहौल के प्रति चिंतनशील होना होगा ! कौन भ्रष्ट हैं? और कौन शिष्ट हैं ? ऐसे प्रश्नों से जितनी जल्दी हम बाहर निकल सकें…..बेहतर होगा …और तभी हम अपने निजी जीवन,परिवार, समाज और राष्ट्र में फैली भ्रष्टता के विरुद्ध एक निर्णायक और परिणामी संघर्ष की पृष्टभूमि रख सकते हैं,” मौलिक और बहुत अच्छे विचार

achyutamkeshvam के द्वारा
February 19, 2016

हरे हरे नोटों को ये काला धन समझे है जनता है भोली-भाली कान बड़े कच्चे हैं संसद सदस्य सभी माननीय कहे जाएँ सम्विधान में लिखे विचार बड़े सच्चे हैं टुच्चे हैं वे लोग हमें कहते हैं दागी-दागी दाग की महत्ता कहाँ समझेंगे बच्चे हैं दागी बन तख्त मिला दागी बन ताज मिला संग मोटा माल मिला दाग बड़े अच्छे हैं

Niha Verma के द्वारा
February 20, 2016

नमस्कार अभिषेक जी…हर प्रकार से एक उत्तम लेख. सच में भ्रष्टाचार का वायरस ऐसा हैं जो सत्य को भी नही छोडता…इसका इलाज़ स्वयं में ईमानदारी तथा स्कूली शिक्षा के शुरुवाती स्तर में पहचान कर गुणवत्ता के साथ करना संभव हो सकता हैं…उत्तम लेख के लिए बधाई आपको.

Rinki Raut के द्वारा
February 21, 2016

अभिषेक जी, बहुत बधाई, भ्रष्टाचार हर स्तर पर मोजूद है, यदि हर कोई इतना प्राण कर ले की वो अपने आप को इस दलदल से बहार रखेगा तो सुधार की संभावना है

rameshagarwal के द्वारा
February 21, 2016

जय श्री राम अभिषेक जी इतने इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर इतना बढ़िया लेख के लिए आप बधाई के पात्र.पहले समाज के लोग भ्रष्ट लोगो से दूर रहते आज मानसिकता बदल गयी अब तो एक ही मापदंड धन रह गया आज ये इतना व्याप्त है की समझ में नहीं आता की क्या किया जाए.आज आधुनिकता  ने सब नैतिकता ख़तम कर दी कैसे भी धन कमाया जाए बस यही ध्येय रह गया.वैसे अभी भी ईमानदार लोगो की कमी नहीं लेकिन वे गिनती के है उम्मीद पर दुनिया कायम है सुधर की आशा के साथ.

sadguruji के द्वारा
February 21, 2016

“जब दूसरों को मौका मिल जाता हैं तो भ्रष्टाचार लगता हैं, जब खुद को मौका लग जाता हैं, तो हमें शिष्टाचार लगने लगता हैं !” सही कहा है आपने ! अच्छे लेखन और ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ चुने जाने की बहुत बहुत बधाई !


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