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युवा भारत की दमदार आवाज : के.कुमार 'अभिषेक'

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आपका ‘धर्म’ क्या है?

Posted On: 18 Jul, 2017 Religious में

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Religion

‘धर्म’ मानव इतिहास के किसी भी कालखंड में सर्वाधिक चर्चित विषय रहा है| धर्म को लेकर विभिन्न महामानवों ने अपने विचार रखे हैं और उनके अनुयायी आज भी उस वैचारिक यात्रा में गतिशील हैं| मूलतः धर्म शब्द का अभिप्राय एक जैविक इकाई के रूप में हमारे कर्तव्यों से जुड़ा है, लेकिन जब भी वैश्विक समाज में धर्म के रूप में स्थापित हो चुकी कुछ सांगठनिक इकाइयों को अपने चिंतन में सम्मिलित करते हैं, तो स्पष्ट पता चलता हैं की धर्म विचार और धारणाओं का एक मिश्रित स्वरूप है| अगर इस्लाम धर्म हजरत मोहम्मद साहब के वैचारिक चिंतन का प्रतिफल है, तो बौद्ध धर्म महात्मा बुद्ध के विचारों और मानव जीवन के प्रति उनकी धारणाओं का प्रतिबिंब है| इसी प्रकार ईसाई धर्म यीशु मसीह और सिख धर्म गुरुनानक देव जी के चिंतन और स्थापित धारणाओं का ही परिणाम है। इन सभी महापुरुषों ने मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं पर चिंतन किया और चिंतन से जो विचार उत्‍पन्न हुए, उसे अपने समर्थकों में बांटने का काम किया। धीरे-धीरे उनकी वैचारिक यात्रा में अनुयायी बढ़ते गए, आगे चलकर अनुयायियों का यही समूह एक धार्मिक समूह के रूप में परिवर्तित हो गया।

ये तो हुई इस वैश्विक समाज में धर्म के रूप में स्थापित हो चुके मानवीय संगठनों कि उत्पत्ति से जुड़ी मूल-अवधारणा। लेकिन एक जैविक इकाई के रूप में धर्म हमारे लिए क्या है? क्या यह सिर्फ एक आस्था और विश्वास का प्रश्न है या हमारी जीवन यात्रा के साथ इसका कोई सीधा और प्रभावी सम्बन्ध भी है? मुख्यतः हम युवाओं के लिए धर्म एक तर्कहीन और तथ्यविहीन कल्पनाओं का स्वरूप मात्र है, लेकिन क्या हम इसे अपने वास्तविक जीवन के पहलुओं से जोड़कर धर्म की एक सरल, परिभाष्य, तार्किक और कल्पनाविहीन व्याख्या कर सकते हैं? मुझे लगता है कि हमें ऐसा जरूर करना चाहिए। मुझे शक है कि इन सभी प्रश्नों के साथ मैं सही न्याय कर पाऊंगा, क्योंकि मेरा प्रयास आपके मस्तिष्क में धर्म की एक और नई व्याख्या का रोपण नहीं, अपितु आपको इस बात के लिए जगाना है कि आपका/हमारा धर्म क्या है? एक इंसान के रूप में हमारा धर्म क्या है? एक पुरुष या स्त्री के रूप में हमारा धर्म क्या है? एक युवा के रूप में हमारा धर्म क्या है? एक छात्र, एक शिक्षक और एक अभिभावक के रूप में हमारा धर्म क्या है? इन प्रश्नों के साथ ही मैं यह याद दिलाना चाहूंगा कि धर्म थोपने का विषय नहीं है। धर्म अंधश्रद्धा और वैचारिक पंगुवाद का विषय भी नहीं है। आपका धर्म सिर्फ आपके लिए चिंतन का विषय है, क्योंकि हम सभी इस ब्रह्मांड में एक जैविक इकाई के रूप में अपने धर्म के बारे में चिंतन करने के लिए स्वतंत्र हैं। मैं एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूं, जो कई कड़ियों में आपके समक्ष रखूंगा। आप अपनी टिप्‍पडि़यों से हमें जरूर अवगत कराएं।

जब भी हम धर्म को वास्तविकता के धरातल पर परिभाषित करने का प्रयत्न करते हैं, धर्म अत्यंत ही सरल एवं सहज विषय प्रतीत होने लगता है। धर्म का सीधा और सरल अर्थ कर्तव्य से है। एक इंसान के रूप में अपने कर्तव्यों के श्रेष्ठ निर्वाह के लिए किया जाने वाला कर्म ही धर्म है। एक पिता के रूप में आपका धर्म है कि अपने बच्चे का सर्वश्रेष्ठ पालन-पोषण करें, उन्हें उच्च कोटि कि शिक्षा ग्रहण करने का अवसर दें। वहीं, पुत्र धर्म कहता है कि आप अपने पिता के प्रति सम्मान रखें, उनके बुढ़ापे में किसी प्रकार के दुख या पीड़ा का कारण न बनें। इसी प्रकार मां के प्रति, अपने भाई के प्रति, दोस्तों-मित्रों और सगे-संबंधियों के प्रति आपकी कुछ जिम्मेदारियां हैं। यही जिम्मेदारियां विभिन्न मानवीय रिश्तों के प्रति हमारा धर्म हैं। एक राजा के लिए प्रजा के प्रति कर्तव्य ही राज धर्म है। इस तरह धर्म को समझना और उससे खुद को जोड़ना न सिर्फ धर्म को बेहद सहज बनाता है, बल्कि यह हमारी जीवनयात्रा को आदर्श भी बनाता है।

भगवद गीता में कहा गया है कि कर्म ही पूजा है। हमें इस वाक्य कि विशुद्ध व्याख्या को समझना होगा। कर्म अर्थात आपके कार्य। अपने उत्तरदायित्वों, अपनी जिम्मेदारियों के सर्वश्रेष्ठ निर्वाह के लिए किया जाने वाला परिश्रम ही पूजा है। सिर्फ इसी पूजा का फल भी आपको प्राप्त होता है। अगर आप अपने पारिवारिक एवं सामाजिक कर्त्तव्यों के सर्वोत्तम निर्वाह के लिए १२ घंटे मेहनत-मजदूरी करते हैं, विश्वास कीजिये आप १२ घंटे पूजा (कर्म) कर रहे हैं। मूल सन्देश यह है कि आप अपनी जिम्मेदारियों का सर्वोत्तम निर्वाह सुनिश्चित करें। आपका धर्म सर्वथा सुरक्षित रहेगा।

इस प्रकार अगर हम अपने जीवन से जोड़कर धर्म और धार्मिक तत्वों की व्याख्या कर सकें, तो काफी हद तक धर्म अपनी काल्पनिकता से वास्तविकता की तरफ प्रवेश करेगा। यहां एक बात और हमें समझनी होगी कि धर्म अगर कर्तव्य है, तो फिर हम कर्तव्यविमूढ़ नहीं हो सकते हैं। सिर्फ इसलिए क्योंकि धर्म कुछ लोगों के लिए धंधा बन चुका है। हम धर्म का त्याग नहीं कर सकते। हमें धर्म को नए नजरिये, नई सोच के साथ देखना होगा और उसे अपने जीवन में वास्तविकता के साथ उतारना होगा। हो सकता है सैकड़ों वर्ष पूर्व, जो बातें कहीं-लिखी गयी हों, तब के समाज और जैव चिंतन के अनुसार सही भी हों, लेकिन आज भी हम उन्ही वर्षों पुरानी धारणाओं के साथ धर्म को परिभाषित करते गए। विश्वास कीजिये धर्म आने वाली पीढ़ी के लिए अबूझ और अछूत बनकर रह जाएगा। अंग्रेजी माध्यम के साथ तैयार हो रही हमारी नई पीढ़ी धर्म को समझ सके, इसके लिए धर्म का परिचय वास्तविकता के साथ कराना बेहद आवश्यक है।

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