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युवा भारत की दमदार आवाज : के.कुमार 'अभिषेक'

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एक अनुसंधान : ईश्वर क्या हैं?

Posted On: 12 Aug, 2017 Religious में

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जब भी ‘ईश्वर’ शब्द हमारे जेहन में आता है, मस्तिष्क स्वतः धार्मिक चिंतन में प्रवेश करने को अग्रसर हो जाता है| वास्तव में अगर हम हजारों वर्षों के मानवीय इतिहास पर एक गहरी नजर डाल सकें, एक स्पष्ट प्रमाणिक तथ्य निकलकर कर सामने आता है कि, ‘हम मनुष्यों ने जब भी ‘ईश्वर’ शब्द को परिभाषित या विश्लेषित करने का प्रयास किया है, पृष्ट्भूमि धार्मिक ही रही है” | यही वजह भी है कि, हम ईश्वर को एक धर्म तत्व के रूप में स्वीकृत करते आये हैं | अब तक कि मान्यताओं के अनुसार ”ईश्वर’ एक ऐसी अलौकिक, अद्वितीय, महापराक्रमी इकाई हैं, जो इस सृष्टि का निर्माता और निर्देशक हैं | इस सृष्टि में किसी भी घटना के होने या न होने कि वजह हैं” |

धर्म और धार्मिक मान्यताओं कि पृष्टभूमि से तैयार ‘ईश्वर’ कि इस परिभाषा को जब भी हम वास्तविकता कि नजर से देखने और समझने का प्रयत्न करते हैं, कुछ स्पष्ट सा नहीं दिखता है| ईश्वर कि इस धार्मिक परिभाषा को जब हम अपने जीवन में ढूंढने का प्रयत्न करते हैं, वहां भी एक विरोधाभास सा प्रतीत होता है | ऐसे में एक संदेह उतपन्न होता है कि, कहीं ईश्वर के प्रति हम गलत विवेचना तो नहीं कर रहे हैं ? कहीं हमारा ईश्वरीय चिंतन सिर्फ काल्पनिक संकल्पना तो नहीं बन कर रह गया है ? जब मैं यह प्रश्न आपके चिंतन हेतु रख रहा हूँ, इसके पीछे धर्म या धार्मिक मान्यताओं पर सवाल उठाना हमारा उदेश्य बिलकुल भी नहीं है| अपितु धर्म और धार्मिक तत्वों कि एक बेहद स्पष्ट, सरल, परिभाषी, तार्किक और हमारी जीवनशैली से सम्बद्ध विवेचना लोगों के समक्ष रखना है, जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी जो ‘धर्म’ और ‘धर्म-तत्वों’ से आपने आपको सम्बन्ध नहीं कर पा रही है, इसे समझ सके |

हमें सोचना होगा कि, अगर धार्मिक पृष्टभूमि आधारित चिंतन से हम ‘ईश्वर’ कि स्वीकार्य परिभाषा तय नहीं कर पा रहे हैं, क्या हमारे वैचारिक/शैक्षणिक चिंतन कि किसी अन्य धारा में ईश्वर को परिभाषित किया जा सकता है ? क्या हम ‘ईश्वर’ और ‘ईश्वरीय शक्ति’ के मानवीय जीवन पर स्पष्ट प्रभावों का खुला विश्लेषण कर सकते हैं ? आइये हम सब मिलकर एक प्रयास करें | ‘ईश्वर’ को नए सिरे से ढूंढने के लिए बेहद आवश्यक हो जाता है कि, हम अब तक मस्तिष्क में जमा अवधारणाओं के चंगुल से कुछ देर के लिए आज़ाद हो जाए | नव-चिंतन सर्वथा शून्य मे ही उतपन्न होता है |

क्या हमारे जीवन में ईश्वरीय शक्ति का प्रभाव है ?

मित्रों, ‘ईश्वर’ शब्द को वास्तविकता के साथ परिभाषित करने के लिए बेहद आवश्यक है कि, हम वास्तविक मानव जीवन पर नजर डालें | जब हम एक सामान्य मानवीय जीवनशैली में ‘ईश्वरीय तत्व’ को ढूंढने का प्रयास करते हैं, एक बात स्पष्टतः निकल कर सामने आती हैं कि, ”हमारे जीवन में ‘ईश्वर’ अर्थात ईश्वरीय शक्ति प्रभावी है” | लेकिन जैसे ही हम इस तथ्य पर पहुंचते हैं, कई प्रश्न प्रश्न खड़े हो जाते हैं कि, कैसे ? हमारे जीवन में ईश्वरीय शक्ति के प्रभाव का स्पष्ट प्रमाण तो धर्म भी नहीं दे सका है, फिर कैसे हम इस तथ्य को प्रमाणित कर सकते हैं ? साथ ही प्रश्न खड़ा होता है कि, यह कौन सी ऊर्जा हैं ? इसकी प्रबलता और स्रोत क्या है ?
GOD
ईश्वरीय शक्ति मानव जीवन में प्रभावी है, लेकिन कैसे ?

इस के लिए हमें अपने सामान्य दिनचर्या के कुछ प्रसंगों पर नजर डालनी होगी | जैसा कि हम देखते हैं – “हमारे आस-पास कुछ लोग मिलकर किसी भारी वस्तु को उठाने का प्रयत्न करते हैं | वे बार-बार प्रयत्न करते हैं लेकिन थोड़ा सा चूक जाते हैं | तभी सभी मिलकर ‘हनुमान/शिव जैसे कथा-कथित ईश्वरीय स्वरूपों का जयकार लगाते हैं, और वस्तु उठ जाती है” | यह परिणाम ऐसे मामलों में ८०-९०% तक होता हैं | मतलब स्पष्ट हैं कि, हमारे जीवन में ईश्वर काल्पनिक नहीं वास्तविक प्रभाव के साथ मौजूद हैं..क्योंकि शाब्दिक उच्चारण से कार्य सफल हो रहे हैं | ऐसा अक्सर देखा गया है कि, कई बार ईश्वर का नाम लेने से हमारा प्रयास सफल हो जाता हैं |

‘ईश्वर’ या ‘ईश्वरीय शक्ति’ कौन सी ऊर्जा है , उसकी स्रोत और प्रबलता क्या है ?

”सर्वप्रथम तो ‘ईश्वर’ कोई अलौकिक शक्ति नहीं हैं | ‘ईश्वर’ को हमारे जीवन में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से सर्वक्षेष्ठ ढंग से परिभाषित किया जा सकता है| ‘ईश्वरीय शक्ति एक प्रकार कि काल्पनिक ऊर्जा है, जो एक आभाषी चरित्र में विश्वास से जन्म लेती है| एक व्यक्ति जब मुश्किल में होता है, तब वह अपने धर्म (आस्था) से जुड़े ईश्वर को याद करता है | जैसे ही वह ईश्वर कि कल्पना करता है, उसे लगता हैं कि अब मेरे साथ कोई है,… कोई है जो मुझे इस संकट से निकाल ले जायेगा | …उसका यह महसूस करना ही उसे आत्म प्रेरित कर देता है,..तत्क्षण में संकट से लड़ने के लिए उसके अंदर एक सकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है, जिसे हम ईश्वरीय शक्ति के रूप में वर्णित कर सकते हैं ” |

जहाँ तक प्रश्न इस ऊर्जा के स्रोत का है, ” ईश्वर’ स्वयं में कोई ऊर्जा स्रोत नहीं हैं, वस्तुतः संकट कि घडी में ईश्वर शब्द के उच्चारण से जो सकारात्मक ऊर्जा हमारे शरीर में आती है, उसका स्रोत स्वयं हमारा शरीर ही हैं | वास्तव में ‘ईश्वर’ एक मन्त्र के रूप में कार्य करता हैं, जिसके उच्चारण से निराश और सुस्त पड़ी हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ प्रबल हो जाती हैं और हमारी आंतरिक ऊर्जा संगठित हो जाती हैं | जैसा कि ऊपर उदाहरण में देखा हमने कि, किस प्रकार लोग ईश्वर का नाम लेकर भारी वस्तु को उठा लेते हैं | यहाँ समझने कि आवश्यकता है कि, ईश्वर का नाम लेने से पूर्व जहाँ, आंतरिक ऊर्जा खंडित थी, वही नाम लेते ही सम्पूर्ण शरीर कि ऊर्जा बाजुओं में केंद्रित हो जाती हैं, जिससे कार्य आसानी से संभव हो जाता हैं | इस ऊर्जा कि प्रबलता का कोई तय पैमाना नहीं हैं, ..लेकिन यह इस हद तक प्रबल नहीं होती है, जिसे चमत्कारी कहा जा सके | अगर आप सामान्य अवस्था में २५ कि.ग्रा. वजन उठा पाने में सक्षम हैं तो, ईश्वर के उच्चारण से और दो-चार कि.ग्रा अधिक उठा सकेंगे | कोई अद्भुत चमत्कार कि सम्भावना शून्य है | ईश्वर कोई अद्वितीय, महापराक्रमी शक्तिस्रोत है, यह सिर्फ एक भ्रम है |

हमारे सामान्य जीवन में ईश्वर के प्रभावों एवं उनका खुला और स्पष्ट विश्लेषण, आपको कैसा लगा ? हमें इन्तजार रहेगा | यह आलेख ‘आपका …धर्म क्या है ?” …कि अगली कड़ी है | अगर आपने अब तक उसे नहीं पढ़ा है, तो एक बार अवश्य पढ़े | एक बार पुनः यह याद दिलाते हुए कि, हम किसी भी धर्म के पक्ष-विपक्ष में चिंतन नहीं कर रहे हैं | ‘धर्म’ हमारे जीवन में वैचारिक अनुशासन के लिए बेहद आवश्यक हैं, लेकिन इसके लिए बेहद जरुरी है कि ‘धर्म’ सरल, अकाल्पनिक, व्यावहारिक और हमारे जीवन में प्रामाणिक हो, तभी यह हमें संयमित, नियमित और अनुशासित कर सकता है | अगली कड़ी में …हम चलेंगे मानव इतिहास के पुराने पन्नों पर …और ढूढेंगे उस ईश्वर को …जिसे हमारे पूर्वजों ने पूजा था | धन्यवाद | जय भारत

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संजय कुमार के द्वारा
August 21, 2017

किसी भी वस्तु के निर्माण के लिए 3 का एक साथ होना जरुरी है. 1- निर्माण सामग्री = Raw Material ( जिसे मैटर कहते हैं) 2- निर्माता ( निर्माण करने वाला)= Creator/ Maker 3- जानकारी या सूचना = Information —– मामूली सी गुडिया हो या अत्यन्त जटिल कम्प्यूटर इन 3 के बिना बनाना संभव नहीं है. ——— जितना जटिल ( Complex) निर्माण उतनी जटिल सूचना जटिल सूचना के लिए बुद्धिमान निर्माता ——- जीवन के लिए जरुरी घटक 1- प्रोटीन ( निर्माण सामग्री) 2- DNA – सूचना बिना DNA के प्रोटीन का बनना असम्भव है क्योंकि प्रोटीन के बनने की सूचना DNA में होती है. बिना प्रोटीन के DNA नहीं बन सकता क्योंकि DNA कोशिका में स्थित है. इसलिए जीवन का निर्माता इनसे अलग होना चाहिए. —— जिसे इस पर प्रश्न करना हो वह पहले इस 3 के संयोग के बिना कोई वस्तु बना कर दिखाएं. 1- निर्माण सामग्री = Raw Material ( जिसे मैटर कहते हैं) 2- निर्माता ( निर्माण करने वाला)= Creator/ Maker 3- जानकारी या सूचना = Information ———————————————– —- बिग बैंग से निर्माण असम्भव – —– नास्तिक सिद्धान्त : अचानक एक ज़ोरदार धमाका ( बिग बैंग) हुआ और दुनिया अपने आप बन गयी। 1. यह धमाका किसने किया और यह किस वजह से हुआ? कल्पना करें एक प्रेस ( छापाखाना ) है. उसमे अलग अलग रंग के स्याही के डिब्बे है. कागज है . तेज भूकम्प आया स्याही उडी और समाचार पत्र छप गया? जीवन समाचार पत्र से हजारों गुणा जटिल है. 2. किस बात में तर्क है—शुरू में कुछ नहीं था फिर सबकुछ अपने आप बन गया, या कोई तो था जिसने सबकुछ बनाया? “जंगल से जाते वक्‍त अगर आपको एक सुंदर-सा घर दिखायी दे, तो क्या आप यह सोचेंगे, ‘अरे वाह! कितना सुंदर घर है। पेड़ अपने आप कटकर आड़े-तिरछे गिरे और यह घर बनकर तैयार हो गया।’ कितनी बेतुकी सी बात है, ऐसा हो ही नहीं सकता! तो हम यह कैसे मान लें कि दुनिया में सबकुछ अपने आप बन गया?” विकासवाद एक कल्पना डार्विन सिद्धान्त : इंसान बंदरों से आया। कुछ का मानना है कि सभी जीवधारी विकसित होकर बने हैं जैसे बंदर से मनुष्य इसमें ईश्वर की जरूरत क्या है? समस्या यह है कि इस बात का अभी तक एक भी प्रमाण नहीं है कि मनुष्य बंदर से विकसित हुआ है. अभी तक यह केवल कल्पना ही है. 3. अगर इंसान जानवरों से आया जैसे बंदर से, तो फिर क्यों इंसान और बंदर के दिमाग में इतना फर्क है? 4. क्यों छोटे-से-छोटे जीव की भी बनावट इतनी अनोखी है? दावा: विकासवाद के पक्के सबूत हैं। 5. विकासवाद का दावा करनेवालों ने क्या खुद इन सबूतों की जाँच की है? 6. क्या आप जानते हैं कि ऐसे कितने लोग हैं जो विकासवाद पर सिर्फ इसलिए यकीन करते हैं क्योंकि उन्हें बताया गया है कि सभी लोग इसे मानते हैं?

संजय कुमार के द्वारा
August 21, 2017

क्या ईश्वर है? कभी एक कागज के मोड़ कर बनाए गए हवाई जहाज के खिलौने को देखें. कागज का जहाज एक बेहद साधारण सी रचना है. मान लीजिए हम कहीं सुनसान जंगल में जा रहे हैं. वहां हमें एक कागज का जहाज कहीं दिखाई देता है. क्या हम यह मानेंगे कि हवा में कागज उड़ा पेड़ों से/ पत्थरों से टकराया लगातार टकराने से कागज ने हवाई जहाज का रूप ले लिया. भले ही हमें वहां कोई आदमी दिखाई ना दे परन्तु तब भी हम कहेंगे कि जरुर इसे किसी ने बनाया है. —– यदि कागज के खिलौने को बनाने वाला कोई है तो पक्षी के परों /पंखों को बनाने वाला भी कोई जरुर होना चाहिए . पक्षी के परों की रचना तो कागज के जहाज से बेहद जटिल है . पंखों की आश्चर्यजनक बनावट अपने पंखों को एक ही बार नीचे की तरफ फड़फड़ाकर एक समुद्री पक्षी बड़ी तेज़ी से आसमान की तरफ निकल पड़ता है। जैसे ही वह ऊँचाई पर पहुँचता है, वह चक्कर काटते हुए हवा के सहारे आराम से और भी ऊपर उठता है। अपने पंखों और पूँछवाले परों के कोण में ज़रा-सा फेरबदल करके वह बिना पंख फड़फड़ाए उड़ सकता है। आखिर यह पक्षी इतनी खूबसूरती और बेहतरीन तरीके से यह कलाबाज़ी कैसे दिखा पाता है? यह काफी हद तक उसके परों का कमाल है! सभी जंतुओं में से सिर्फ पक्षियों के पर होते हैं। ज़्यादातर पक्षियों के शरीर में तरह-तरह के पर होते हैं। एक तरह का पर जो हमें साफ दिखायी देता है, वह है देहपिच्छ (कंटूर फेदर्स्)। ये पर पक्षी के पूरे शरीर में पास-पास सटे हुए पाए जाते हैं। इनसे पक्षियों का ऐसा आकार बनता है, जिससे वे बड़ी आसानी से हवा में उड़ पाते हैं। देहपिच्छ, पक्षी के पंख और पूँछ पर पाए जाते हैं, जो उड़ने के लिए बेहद ज़रूरी होते हैं। एक हमिंगबर्ड में 1,000 से भी कम और एक हंस में 25,000 से भी ज़्यादा देहपिच्छ हो सकते हैं। पक्षियों के पर वाकई बेमिसाल कारीगरी का सबूत हैं! पर की बीचवाली डंडी को रेकिस कहा जाता है, जो लचीली और काफी मज़बूत होती है। इस डंडी से परों के रेशों (बाब्र्स्) की कतारें निकलती हैं और ये रेशे एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इस तरह पर के दोनों तरफ का हिस्सा समतल होता है जिसेवेन कहा जाता है। परों के रेशे एक-दूसरे से कैसे जुड़े रहते हैं? हर रेशे में सैकड़ों और भी छोटे-छोटे हुकनुमा रेशे (बाब्र्यूल्स्) होते हैं, जो आस-पास के हुकनुमा रेशों से फँसे होते हैं। ये एक ज़िप की तरह काम करते हैं। जब ये छोटे-छोटे रेशे खुल जाते हैं, तो पक्षी को सिर्फ अपने पंखों को सँवारने की ज़रूरत होती है, जिससे हुकनुमा रेशे दोबारा एक-दूसरे से फँस जाते हैं। अगर आप भी एक बिखरे पर को हलके-से अपनी उँगलियों से सँवारें, तो आप पाएँगे कि उनके रेशे वापस एक-दूसरे से फँस जाते हैं और पर फिर से समतल हो जाता है। खासकर उड़ान में मदद देनेवाले पर समान आकार के नहीं होते हैं। पर के पीछे का हिस्सा, आगे के हिस्से से ज़्यादा चौड़ा होता है। इस तरह की डिज़ाइन हवाई जहाज़ के पंखों में देखने को मिलती है। इसी डिज़ाइन की वजह से, पक्षी का हरेक पर एक छोटे पंख की तरह काम करता है और उड़ान भरने में मदद देता है। इसके अलावा, अगर आप पक्षियों की उड़ान में मदद देनेवाले एक बड़े पर की जाँच करें, तो आप पाएँगे कि रेकिस के निचले हिस्से में खाँचा बना होता है। इस मामूली-सी डिज़ाइन से रेकिस को मज़बूती मिलती है। इसलिए आप रेकिस को किसी भी तरह मोड़ दीजिए, यह मुड़ी नहीं रहेगी बल्कि वापस सीधी हो जाएगी। परों के अनेक काम देहपिच्छ के बीच-बीच में रोमपिच्छ (फाइलोप्लूम्स्) नाम के लंबे और पतले किस्म के पर औरपाउडर फेदर्स् भी पाए जाते हैं। माना जाता है कि रोमपिच्छ की जड़ों में कुछ इंद्रियाँ होती हैं, जो बाहरी परों में किसी तरह की गड़बड़ी पैदा होने पर फौरन पक्षी को खबरदार कर देती हैं। इसके अलावा, इन इंद्रियों की मदद से पक्षी हवा में अपनी रफ्तार का भी पता लगा सकता है। सिर्फ पाउडर फेदर्स् के रेशे लगातार उगते हैं और पक्षी के शरीर से कभी नहीं झड़ते। इसके बजाय, ये रेशे महीन पाउडर बन जाते हैं और पक्षी के शरीर पर जलरोधक का काम करते हैं। पक्षियों के परों का एक और काम है। वे पक्षियों को गरमी, सर्दी और सूरज की खतरनाक किरणों से बचाते हैं। मिसाल के लिए, समुद्री बत्तख महासागर की चुभनेवाली ठंडी हवाओं में पलती-बढ़ती हैं। कैसे? उनके भरे-पूरे देहपिच्छ के नीचे नरम, रोएँदार परों की एक मोटी परत मौजूद होती है। इन परों को कोमलपिच्छ (डाऊन फेदर्स्) कहते हैं। ये पर लगभग 1.7 सेंटीमीटर की मोटाई तक घने हो सकते हैं और इनसे बत्तख का ज़्यादातर शरीर ढका होता है। कोमलपिच्छ, शरीर की गरमी को बाहर न निकलने देने में इतने असरदार होते हैं कि अब तक इंसानों ने ऐसी कोई चीज़ नहीं बना पायी है जो इसकी बराबरी कर सके। समय के गुज़रते, पक्षियों के पर खराब या नष्ट हो जाते हैं, इसलिए पक्षी अपने पुराने परों को गिरा देते हैं और उनकी जगह नए पर उग आते हैं। ज़्यादातर पक्षियों के पंख और पूँछ के पर एक निश्‍चित समय में और थोड़े-थोड़े करके झड़ते हैं, जिससे कि उन्हें उड़ने में कोई परेशानी नहीं होती। हवाई जहाज़ों की डिज़ाइन बनाने, उन्हें आकार देने और उन पर कुशलता से काम करने के बाद ही, ये उड़ने के लायक बनते हैं। उड़ने के लिए सिर्फ पक्षियों के पर काफी नहीं विकासवादियों के लिए सिर्फ यह एक मुश्किल नहीं कि परों की बनावट में कोई खोट नहीं है। क्योंकि देखा जाए तो पक्षी का एक-एक अंग उड़ने के लिए ही बना है। मिसाल के लिए, पक्षियों की हड्डियाँ हलकी और खोखली होती हैं और उनकी साँस लेने की व्यवस्था बहुत ही अनोखी और बढ़िया है। इतना ही नहीं, उनके शरीर में खास किस्म की माँस-पेशियाँ होती हैं, जो पंखों को फड़फड़ाने और उन्हें काबू में रखने में मदद देती हैं। यहाँ तक कि पक्षियों में कई ऐसी माँस-पेशियाँ भी हैं, जो हरेक पर को अपनी जगह में बनाए रखती हैं। यही नहीं, पक्षियों की नसें हर माँस-पेशी को उनके मस्तिष्क से जोड़े रखती हैं। यह मस्तिष्क है तो छोटा, मगर बड़ा बेमिसाल है, क्योंकि यह पक्षियों के उड़ने की सारी व्यवस्था को एक-साथ, अपने आप और ठीक-ठीक काबू में रखता है। जी हाँ, पक्षियों को उड़ने के लिए सिर्फ परों की नहीं, बल्कि इन सभी अंगों की ज़रूरत होती है। —- यदि कागज के जहाज का निर्माता मनुष्य है तो पक्षियों का निर्माता ईश्वर है


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